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गुरुवार, 6 नवंबर 2014

बाबा बैद्यनाथ मिश्र यात्री - नागार्जुन के आई पढ़ु -देवशंकर नवीन जीक कलम सs ......


बाबा बैद्यनाथ मिश्र यात्री "नागार्जुन" के अवसान दिवस पर "नव मिथिला" द्वारा आयोजित "यात्री साहित्य सप्ताह" पर सप्ताहिक आलेख पर आई देवशंकर नवीन जीक कलम सs लिखल आलेख । 


देवशंकर नवीन
प्रोफेसरए भारतीय भाषा केन्‍द्रए
भाषाए साहि‍त्‍य एवं संस्‍कृति‍ संस्‍थान
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालयए नई दिल्ली 110067



आकाशधर्मा बाबा

बाबा माने बाबा यात्रीए वैद्यनाथ मिश्र ष्यात्रीष्ए नागार्जुन! हुनका सम्बन्धमे लिखब असाधारण काज थिक। अभिप्राय ई नइँए जे हम असाधारण काज करष् जा रहल छीए अपितु ईए जे जँ ई काज वांछित घनत्वक संग पूर भष् जाएए तष् सत्ते ई असाधरण काज होएत। हमरा बुझने बाबासँ सम्पर्कि‍त सष्ब व्यक्तिक संग ई स्थिति रहैत हेतनि।
बाबा यात्रीसँ पहिल भेंट सन् 1985मे भेल छलए पटनामे। माध्यम छलाह  तारानन्द वियोगी। तहिया वियोगी पटना विश्वविद्यालयमे संस्कृतसँ एमण्एण् कष् रहल छलाहए आ हम डालटनगंजमे मैथिलीक व्याख्याता भष् गेल छलहुँ। छुट्टी.छपाटीमे गाम जेबा काल बाट पटने भेल करए। वियोगी हमर प्रतीक्षा करैत रहथि। महेन्द्रूए भगीरथी लेनमे वियोगीक बासा छलनि। बाबा ओइ अवधिमे पटनेमे छलाहए हरिहर प्रसाद जीक बासा पर।ण्ण्ण्हम भोरे.भोर पटना पहुँचल रही। वियोगी हमर झोड़ा.झपटा उनटा कए कस्टम ऑफिसर जकाँ चे¯कग करष् लगला। चे¯कग समाप्त भेलए ता खुट.खुट;लाठी टेकष्क आवाजद्ध आ खट.खट;केबाड़ खटखटएबाक आवाजद्ध भेल। केबाड़ फोलल गेल। चरण.स्पर्शए परिचय पात सब भेल। परिचयमे वियोगी हमरो मादे रेखांकित करैत कहलखिन..बाबा! नीवन जी मूलतः साइन्सक विद्यार्थी छथि! बसए बाबा सेहो एकरा रेखांकित कष् लेलनि आ हमरा साइन्स बला विद्यार्थी कहष् लगला।
सेए भेलै ईए जे वियोगी जे हमर कागज पत्तर छिडि़यौने छलाहए ताहि पर नजरि दैत बाबा बजलाह..ओ कागत कविता सन लगैत अछि!
वियोगी बजलाह..हँ बाबाए नवीन लिखलनि अछि!
..सुनाउ!
हमर सौभाग्यए जे हिन्दीमे लिखल हमर ओइ कविताक पहिल श्रोता बाबा भेलाह। काव्य पाठक पश्चात कनेक काल धरि बाबा कविताक समझ पर बजैत रहलाह आ हमरा लोकनि मन्त्रा.मुग्ध सुनैत रहलहुँ। ओही जतरामे एक दिन साँझ कए हम आ वियोगीए बाबाक दर्शनार्थ हरिहर जीक बासा पर पहुँचलहुँ। हम ता बाहरे रही। बाबा वियोगीकें पुछलखिन..वो साइन्स वाले विद्यार्थी नहीं आएघ्..ता हम ऊपर चढ़लहुँ। हमरा देखि बाबा आश्वस्त होइत बजलाह..हाँ आए तो।
फेर बाबा सिरमासँ राजकमल पेपरबैक्स बला चारिटा पोथी उठौलनि..आज निराला दिवस है। ये पुस्तकें आपको देनी थी। आपका नाम भूल गया था। नाम बोलिए!
हम नाम कहलिअनि आ मोने.मोन प्रफुल्लित भेलहुँ। कल्पना करष् लगलहुँ जे बाबा लिखताह..चिरंजीवी अथवा आयुष्मान् नवीनण्ण्ण्सोचिते रही कि ता किताब हाथमे आबि गेल। ओइ पर लिखल छल..प्रिय मित्रा देण्शंण्झा नवीन के लिएए नागार्जुनए निराला दिवसए 1985ण्
लोक कल्पना कष् सकैत अछि जे सन् 1985क ओ वसन्त पंचमी हमरा लेल कतेक महत्त्वपूर्ण रहल हएत। दू टा कविता कोनो चपरकनाती अखबारमे छपैत देरी आइ काल्हि लोक प्रौढ़ लेखक भष् जाइए आ परवर्ती लोककें चेला मूड़ष् लगैष्एए मुदा बाबाकें हम मित्रा लगै छलिअनिण्ण्ण्उदारताक ई क्षितिज साधारण व्यक्तिकें तँ नहिएँ ने भेटतै!
पटनामे बाबासँ फेर.फेर भेंट.घाँट आ गप.शपक प्रक्रिया तँ बड़ नमहर अछिए मुदा दिल्लीमे ताहिसँ बेसी नमहर आ घनिष्ठ अछि। दिल्ली प्रवासमे बाबाक आसन बेसी काल जेण्एनण्यूण्मे प्रोण् मैनेजर पाण्डेयक ओतए रहनि। ताहिमे बाबाकें सादतपुरसँ आनब आ ओतए पहुँचाएबए हमर ड्यूटी भष् जाइ छल।
भोर.साँझक अवकाश काल हुनका संगें वार्तालापमे आ कि हुनका घुमएबामे बीतै छल। पुस्तक मेला घुमएबाक आ कि आन कोनो भ्रमणमे हुनका संग रहबाक जे अनुभव प्राप्त भेल..से कोनो मनुष्यकें आम जनतासँ जोड़बा लेलए जीवनमे प्रसन्नता भरबाक लेल अनुपम छल। सबटाक चर्चातँ असम्भव अछिए किछु आत्मश्लाघा सेहो भष् जाएत। तें किछु प्रसंग एतए उल्लिखित अछिण्ण्ण्
मोन पड़ैत अछि जे पहिल बेर बाबाकें जेण्एनण्यूण् आनष् लेल सादतपुर गेल रही। पता लिखल छलए मुदा घर नइँ देखल छल। सादतपुर बजारमे प्रवेश करिते एक टा बटोहीसँ पता पूछए लगलहुँ। एक टा पान बला एक दिशसँए आ दोसर तरकारी बेचष् बला दोसर दिशसँए उपकैर कष् जिज्ञासा केलनि..कहाँ जाना हैघ् बाबा के यहाँघ्ण्ण्ण्हमरा अबिचंक लागि गेल। बाप रे! दिल्ली सन सम्वेदना शून्यमे शहरकें मैथिली.हिन्दीक जनकवि एतेक सम्वेदनशील बनौने छथिए जे हुनका ओतए पहुँचैबला आगन्तुकष्क स्वागत पटरी.दोकानदार धरि करै छथि! अद्भुतण्ण्!
पान दोकान पर पान खेलहुँ। दोकानदार पैसा नइँ लेलनि। कहलनि आप बाबा के यहाँ आए हैंए उनके गेस्ट हैंए मेरे भी गेस्ट हुए। आपसे पैसा कैसे लूँघ् खैरण्ण्ण्! हुनका लोकनिक देखओल बाट धेने बाबाक ओतए पहुँलहुँ। चाह.पनिक बाद जेण्एनण्यूण् बिदा भेलहुँ। टैक्सीमे बैस कष् घुरबा काल बाबा कहलनि..ड्राइवरक नाम पुछही;आब बाबा हमरा ष्तोंष्क सम्बोधन देबए लागल छलाहद्ध! 
बाबाक आज्ञा के टारितएघ् हम पुछलिअइ..ड्राइवर साहेब! बाबा आपका नाम जानना चाहते हैं! ड्राइवर परम अकरू छल। बाजल..के करोगे म्हारा नाम जाण के ताऊघ्ण्ण्ण्हमरा बड़ अपरतिब सन लागल! एहेन उडण्ड अछि ई ड्राइवर! मुदा अइमे ओकर कोनो दोष तँ छलै नइँ! ओकरा नजरिमे बाबाक मूल्य जेण्एनण्यूण्सँ सादतपुर धरिक किराया मात्रा छलै। ओ अपन नाँ.ठेकान नइँ के नइँ कहलक! जेण्एनण्यूण् पहुँचै सँ कनिएँ पहिने टैक्सी रोकि कष् हम एक ठाम किछु सामान लै लए उतरलहुँ। पाँचेक मिनट बाद आपस आबि टैक्सीमे बैसि बिदा भेलहुँ। बाबा अपनहि फुरने कहलनि..हिनकर नाम छिअनि राजेन्दर! हिनका एकटा छोट सन बेटी छनि। माइ संगमे रहै छनि। हिनका जिलेबी बड़ सुअदगर लागै छनि।ण्ण्ण्हम सोचै लगलहुँए आखिर कोन एहेन मन्त्रा ई फुकने हेथिनए जइ पर ई अकरू ड्राइवर पघिल गेल हैत!ण्ण्ण्टैक्सी ड्राइवरक एक टा एहने कथा आओर अछि। अनवर जमालक एम्बेसेडरमे बाबाक संगें कतौ जाइ छलहुँ। बैसिते देरी बाबा कहलनि..ड्राइवरक नाम पुछही ने! हमरा पुरना कथा मोन पडि़ गेल। फेर ई टैक्सीबला अनटोटल बात कहि कष् अपरतिब करत। मुदा हमरा शष्कमे छलहे कीघ् बाबा कहै छथिए तँ पुछइए पड़त! पुछलिअइ! ड्राइवर जबाब देलक..हम दोसर ठामक छी!ण्ण्ण्रच्छ रहल ई ड्राइवर ओहेन उडण्ड नइँ छल! बाबाकें ओकर जबाबक सूचना देलिअनि। बाबा कहलनिए तैयो नाम पुछही ने! हम फेर सँ नाम पुछलहुँ। ओ नाम कहलक। बाबा फेर कहलनि..पुछही तँ घरमे के सब छैघ्..सेहो जवाब भेटल। ड्राइवर मुस्किआइत जवाब दिअए। ओकरा होइए जेना कोनो बेकुफ लोक सबकें गाड़ीमे बैसौने अछि।ण्ण्ण्फेर घरक सभ सदस्यक रोजगारए पढ़ाइए उम्रए काज.धन्धा आदि पुछबौलनिण्ण्ण्। अभिप्राय ईए जे बाबाक जनसरोकार कोन क्षितिज धरि पहुँचै छल। आधो घण्टा जकरा संग बीततए तकरासँ एकात्म्य स्थापित करबा लेल एते उताहुल रहै छलाह।
ओही यात्रामे बाबा हमर जिन्स पैण्टकें घिचैत बजलाह..एकरा साफो करै छिहीघ्
..हाँ!
..कते दिन परघ् के साफ करै छौघ्
..बाबा! हफ्ता दिन पर अपनहि साफ करै छिअइ!
दू पल गुम रहलाह। फेर हमर बाँहि आ अँगुरी हँसोथैतए मुस्किआइत बजला..तों कोनो सरदारनीसँ बिआह कष् ले!ण्ण्ण्आ हँसए लगलाह।
हम हँसैत पुछलिअनि..ताहिसँ की लाभ होएतघ्
बाबा बजलाह..कपड़ा बस्तर साफ कष् देतौ आ कते दुबराएल छें! खूब खोऔतौए मोटा कए भिसिण्ड भष् जेबें।ण्ण्ण्
अजगुत सम्वेदना छल बाबाक! कौतुको करै काल हुनकर ममता कतेक सूक्ष्म रहै छलनि! आए ई कोनो हमरहि टा संगे नइँ होइ छलनि। जते गोटए बाबाक सान्निध्यमे रहलाह अछिए सभक संगें इएह व्यवहार रहै छलनि। देह रहैत विदेह लोक अहिना होइत अछि।

अहि स आगू अगिला दिन ............. 




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